'लेह-लद्दाख’: असीम सौंदर्य | Leh–Ladakh: A beautiful destination

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'लेह-लद्दाख’ का नाम जेहन में आते ही, एक 'असीम प्राकृतिक सुंदरता’ दिमाग में कौंधने लगती है। सच में, लेह-लद्दाख एक ऐसी जगह है, जहां प्रकृति ने कदम-कदम पर इतना 'सौंदर्य’ बिखेरा है कि कोई भी अभिभूत हो सकता है। वैसे तो लेह जाने के लिए मई के अंतिम सप्ताह से सितंबर तक का मौसम अच्छा माना है, लेकिन बर्फीला सौंदर्य देखने के इच्छुक लोग सर्दियों में भी जाना पसंद करते हैं। लद्दाख की संस्कृति और धार्मिक, ऐतिहासिक विरासत इसे 'पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र’ बनाता है। समुद्र तल से करीब 10,000 किमी की ऊंचाई पर पहुंचकर वहां का जो सुंदर अनुभव मिलेगा, उसे कोई भी भूल नहीं सकता है।



 भौगोलिक बदलाव का महत्व
 माना जाता है कि लद्दाख किसी बड़ी झील के डूब का हिस्सा है, जो कालांतर में भौगोलिक परिवर्तन के कारण लद्दाख की घाटी बन गया। दसवीं शताब्दी के दौरान लद्दाख तिब्बती राजाओं के उत्तराधिकारियों के शासन में था। 17वीं शताब्दी में राजा 'सेनगी नामग्याल' के शासनकाल के दौरान हिमालयन साम्राज्य अपने चरम पर था। 1834 में डोगरा राजा गुलाब सिंह के जरनल जोरावर सिंह ने लद्दाख पर आक्रमण किया और उसे जीत लिया। 1842 में एक विद्रोह हुआ, जिसे कुचल दिया गया और लद्दाख को जम्मू कश्मीर के डोगरा राज्य में विलीन कर लिया गया। इस तरह 18वीं शताब्दी में लद्दाख जम्मू और कश्मीर क्षेत्र में शामिल हुआ और अब यह जम्मू और कश्मीर का एक प्रमुख राज्य है।
लद्दाख, विश्व के दो प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं, काराकोरम और हिमालय के बीच, समुद्र की सतह से 3,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसके अतिरिक्त, जास्कर और लद्दाख की समानांतर पर्वतमालाएं, लद्दाख की घाटी को चारों ओर से घेरती हैं।
 कम रहती है आक्सीजन की मात्रा
  leh ladakh आप जिस भी रास्ते से जाएं, इस बात का ख्याल रखें कि लेह में आक्सीजन की मात्रा कम होती है। मैदानी क्षेत्र से जाने वालों को उल्टी, सरदर्द, चक्कर और सांस लेने में परेशानी का अनुभव हो सकता है। वैसे सड़क मार्ग से धीरे-धीरे ऊपर जाने पर शरीर अपने-आप को व्यवस्थित करता जाता है, मगर हवाई जहाज से यात्रा करने वालों का शरीर तुरंत खुद को वातावरण के अनुकूल नहीं कर पाता, इसलिए परेशानी होती है। आप लेह पहुंचने को होंगे तो हवाई जहाज के अंदर और बाहर एयरपोर्ट पर भी आपको सलाह दी जाती है कि पहुंचने के बाद कम से कम 24 घंटा आराम कर खुद को वातावरण के अनुकूल बना लीजिए ताकि आप आराम से घूमने का लुत्फ ले सकते हैं।


 जब आप लेह पहुंचेगे तो कई होटल मिलेंगे रहने के लिए और लोग घरों में रेस्ट-हाउस भी चलाते हैं। आप अपनी जेब के हिसाब से रहने की व्यवस्था करें। खाने-पीने की सभी चीजें उपलब्ध होती हैं। आप तिब्बतीयन खाने का भी स्वाद ले सकते हैं। यहां मोमो और थुकपा हर जगह मिलेगा आपको। सूप, नुडल्स आदि भी खाया जाता है।
 समय लेकर चलें
 leh ladakh घूमने के लिए कम से कम आपको छह दिन की आवश्यकता है। मगर, यहां की संस्कृति को जानना चाहते हैं तो दो सप्ताह भी कम है। फिर भी, आप अपना टूर इस तरह से बना सकते हैं। पहले दिन मनाली वाले रास्ते पर लेह से शे, थिक्से, हेमिस मोनेस्ट्री के अलावा स्तोक पैलेस और सिंधु नदी के तट पर जा सकते हैं।
 दूसरे दिन श्रीनगर वाले रास्ते पर लेह से हॉल आफ फेम, पत्थर साहेब गुरुद्बारा, मैग्नेटिक हिल, सिंधु-जास्कर संगम से अलची तक जा सकते हैं। तीसरे दिन दुनिया की सबसे ऊंची सड़क देख सकते हैं, (नुब्रा घाटी वाले रास्ते पर) खारदुंगला जाते हुए। नुबरा में आपको रात ठहरना होगा। अगले दिन आप नुबरा की वादियों में घूमने के अलावा दिस्कित मानेस्ट्री जा सकते हैं। वापसी में लेह पैलेस और शांति-स्तूप घूमा जा सकता है।
 अगले दिन यानि चौथे दिन आप पगोंग लेक जा सकते हैं, चांगला-पास दर्रे से गुजरते हुए। इसके लिए आपको एकदम सुबह निकलना होगा, तभी शाम तक वापस आ सकते हैं, वरना रात को वहीं रूकना पड़ेगा। हालांकि वहां होटल और टेन्ट की सुविधा उपलब्ध है। विश्व प्रसिद्ध पैंगांग त्सो का पैंगोग झील अपने नीले रंग के कारण बहुत लोकप्रिय है। झील में आपको चिड़ियां भी मिल सकती हैं। ध्यान रहे कि नुबरा और पैंगोग लेक जाने के लिए रास्ते के परमिट की आवश्यकता होती है। इसे आप लेह में ही बनवा लें तो आपका समय बच जाएगा। इसे आपका ड्राइवर और होटलवाला भी बनवा सकता है। बस अपना अधार कार्ड साथ रखना न भूलें। प्रतिव्यक्ति कुछ पैसे भी लगते हैं।


 खास जगहें
 'शांति स्तूप’
 यह लेह से पांच किलोमीटर की दूरी पर है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई लगभग 14,000 फुट है। यहां महात्मा बुद्ध की अनुपम प्रतिमा स्थापित है। इसका निर्माण 1983 में दलाईलामा के आदेश पर कराया गया। निर्माण कार्य 1991 में पूरा हुआ और इसका उद्घाटन 14वें दलाई लामा तेनजिंग ग्यात्यो ने किया था। आप यहां से पूरे शहर का अवलोकन कर सकते हैं। शाम को बहुत खूबसूरत लगता है शांति-स्तूप।
 'लेह पैलेस’
 शहर के मध्य में स्थित इस महल का निर्माण सोलहवीं शताब्दी में सिगे नामग्याल ने करवाया था। इस महल में भगवान बुद्ध के जीवन को दर्शाते चित्र देखने लायक हैं। यह महल राजा सेंगे नामग्याल द्बारा 17वीं सदी में बनाया गया था। यह नौमंजिला महल है मिट्टी और लकड़ी का बना हुआ है। इस महल की देखरेख पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्बारा की जा रही है। परन्तु इसकी हालत अत्यंत जर्जर है। महल की इमारत ल्हासा में पोताला पैलेस, जो कि तिब्बत में है, की तरह है। जब डोगरा के बलों ने 19 वीं सदी में लद्दाख पर कब्जा कर लिया था, तब शाही परिवार को महल छोड़ना पड़ा था और उन्हें स्टोक पैलेस जाना पड़ा था। यहां से भी शहर और पहाड़ की खूबसूरती देखने लायक है। यहां एक आर्ट गैलरी भी है, जहां आप पुराने लद्दाख की झलक पा सकते हैं।
 'स्तोक महल’
 यह महल लेह से 17 किमी दूर स्थित है। स्तोक महल में शाही परिवार के लोग रहते हैं। यहां के संग्राहालय में लद्दाखी चित्र, पुराने सिक्के, शाही मुकुट, शाही परिधान एवं अन्य शाही वस्तुए संग्रहित है।
 'गोस्पा तेस्मो’
 लेह महल के पास ही बनाया गोस्पा अर्थात बौद्ध मठ एक शाही मठ है। महात्मा बुद्ध की प्रतिमा से सुसज्जित यह मठ पर्यटकों को दूर से ही आकर्षित करता है।
 'शे पैलेस’
 लेह से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पीतल की बौद्ध की प्रतिमा देखने योग्य है। 1650 के आसपास इसका निर्माण हुआ था। अब यह जर्जर अवस्था में है, मगर बौद्ध मंदिर में जब आप प्रवेश करेंगे तो आपको बहुत शांति का अनुभव होगा।
 'थिकसे मठ’
यह मठ लेह के सभी मठों से आकर्षक और खूबसूरत है। स्थानीय भाषा में थिकसे का अर्थ पीला होता है। यह गोम्फा पीले रंग का होने के कारण थिकसे गोम्फा कहलाया। 12 हजार फीट की पहाड़ी पर बनी हुई यह गोम्फा तिब्बती वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है। यह मठ गेलुस्पा वर्ग से संबंधित है। वर्तमान में यहां लगभग 8० बौद्ध संन्यासी रहते हैं। अक्टूबर-नवंबर के बीच यहां थिकसे उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह मठ लेह से 25 किलोमीटर दूर है। यहां 'महात्मा बुद्ध’ की एक 'विशाल प्रतिमा’ है, जिसे देख कर दर्शक मंत्र मुग्ध रह जाते हैं। यहां से 'सिंधु घाटी का बहुत खूबसूरत नजारा’ दिखता है। 12 मंजिलों वाले इस मठ में कई भवन, मंदिर और भगवान बुद्ध की मूर्तियां हैं।


 'स्तकना’
 स्तकना (टाइगर नाक) की आकार की एक पहाड़ी पर स्थापित एक बौद्ध मठ है। यह लेह के 45 किमी दक्षिण में है, जहां लेह शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसका निर्माण लगभग 1580 में महान विद्बान संत चोसजे जम्यांग पालकर ने किया था।
 'हेमिस मठ’
 लेह से 45 किलोमीटर की दूरी पर है हेमिस मठ। इसका निर्माण 1630 ई में स्टेग्संग रास्पा नंवाग ग्यात्यो ने करवाया था। 1972 में राजा सेंज नापरा ग्वालना ने मठ का पुर्ननिर्माण करवाया। मठ की स्थापना धर्म की शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। यहां का मुख्य आकर्षण तांबे की धातु में ढली भगवान बुद्ध की प्रतिमा है। अभी इस मठ की देखरेख द्रुकपा संप्रदाय के लोग किया करते हैं। हेमिस में जाकर जब मंत्रोचार के बीच आप दर्शन करते हैं। बौद्ध मूर्ति का तो नि:संदेह आत्मिक शांति का अनुभव करेंगे।
  'हॉल ऑफ फेम’
 लद्दाख में भारतीय सेना की वीरता व कुर्बानियों का इतिहास समेटने वाले हॉल ऑफ फेम को एशिया के सर्वश्रेष्ठ 25 संग्रहालयों की सूची में शामिल किया गया है। यह संग्रहालय देश के पांच संग्रहालयों में सबसे ऊपर है। हॉल ऑफ फेम का निर्माण लेह में 1986 में हुआ था, इसमें लद्दाख में सियाचिन ग्लेशियर व कारगिल में पाकिस्तान से हुए युद्धों के साथ अन्य सैन्य अभियानों में भारतीय सेना की उपलब्धियों के साथ क्षेत्र की कला व संस्कृति को भी संजोया गया है, इसमें युद्ध स्मारक के साथ वार सीमेट्री, एडवेंचर पार्क बनाकर लोगों को समर्पित किया गया है।
'गुरुद्बारा पत्थर साहेब’
 यह स्थल लेह श्रीनगर मार्ग पर लेह से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यहां एक शिला पर मानव आकृति उभरी हुई है। कहा जाता है कि यह आकृति सिक्खों के प्रथम गुरु नानक देव जी का है। सेना इस गुरुद्बारे का संचालन करती है।
 'मैग्नेटिक हिल’
 यह ऐसी पहाड़ी है, जिसे मैनेटिक हिल के नाम से जाना जाता है। यहां गाड़ी बंद कर छोड़ दीजिए तो वह खुद ब खुद ऊपर की ओर जाने लगता है। लोग यहां रूककर एक बार जरूर परीक्षण करते हैं कि सत्य क्या है। पास ही एक रेस्तरां है, जहां बैठकर आप अपना कौतुहल शांत कर सकते हैं।
 'जास्कर-सिधु संगम’
 लेह से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर है जास्कर सिंधु संगम स्थल। यह नीमो गांव के पास है। यहां दोनों नदियां मिलती हैं, मगर मिलकर भी अलग लगती है, क्योंकि दोनों का रंग अलग है। यह देखना बेहद रोमांचकारी लगता है। सर्दियों में जास्कर नदी जम जाती है और लोग इसे पैदल चलकर पार करते हैं।
 'अलची’
 सिंधु नदी के किनारे यह मठ लद्दाख की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस मठ की दीवारों में भगवान बुद्ध की हजारों पेंटिंग बनी हुई है।
 'लेह बाजार’
 लेह के बाजारों में सबकुछ उपलब्ध है। मगर, आप स्वेटर, शॉल आदि ऊनी कपड़ों के अलावा स्मृति चिन्ह ले सकते हैं। तिब्बती चांदी के गहने और पारंपरिक लद्दाखी गहने भी पर्यटक साथ ले जाना पसंद करते हैं। खुबानी भी साथ ला सकते हैं आप।
 'रेंचो कैफे’
 थ्री इडियट के बाद 'द्रूक व्हाइट लोटस' स्कूल भी एक दर्शनीय स्थल में तब्दील हो गया। लोग यहां भी जाना पसंद करते हैं।
 'चांगला दर्रा’
 चांगला दर्रा’ को पार कर ही पंगोग पहुंचेंगे आप। यह दर्रा तिब्बत के एक छोटे से शहर तांगत्से को जोड़ता है। चांगला को दुनिया का तीसरा सबसे ऊंचा परिवहन योग्य दर्रा माना गया है। ऊंचाई है 17688 फीट। इसका नाम इस दर्रा’ में स्थित चांग-ला बाबा के मंदिर के नाम पर रखा गया है, यहां बर्फ ये ढकी चोटियां दिखेंगी आपको। यहां आर्मी के कैंप लगे हैं।
 'पांगोग झील’
लेह से पांगोग झील की दूरी लगभग 150 किलोमीटर है। पांगोग त्सो या पांगोग झील एक ऐसी झील है, जो 134 किमी लंबी है। यह लद्दाख से तिब्बत पहुंचती है। इसका पानी खारा है और यह कुछ-कुछ देर में रंग बदलती है। सर्दियों में पूरी झील जम जाती है। इस पर आप गाड़ी चला सकते हैं। इस झील का तीन हिस्सा चीन के पास है। समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 14,000 फुट की है और 700 फुट से लेकर चार किलोमीटर चौड़ी है। यह झीली इतनी खुबसूरत है कि आप घंटो देखना चाहेंगे। पांगोग के लेह-मनाली हाईवे पर कारु से एक रास्ता पांगोग के लिए बांए मुड़ता है और सीधा रास्ता मनाली की ओर जाता है। कारु से चांगला करीब 40-45 किमी की दूरी पर है। रास्ते में ऊंचे-ऊचे भूरे पहाड़ मिलेंगे तो नीचे घाटी में हरे रंग के खेतों के बीच पीले सरसों के खेत जैसे धरती की चादर पर पैचवर्क किया गया हो। पांगोग झील जाने के लिए आपको पांच घंटे का सफर तय करना होगा। रास्ते की मुश्किलें अलग है। मौसम की मेहरबानी रही तो समय पर पहुंच सकते हैं।
 'खारदुंगला पास’
 लेह से खरदुंगला टॉप की दूरी 40 किमी है। लेह का खरदुंगला टॉप दुनिया की सबसे ऊंची रोड मानी जाती है। ठंड में यहां का तापमान शून्य से 35 डिग्री तक नीचे चला जाता है। यह समुद्रतल से 18,380 फीट की ऊंचाई पर है। आप यहां पहुंचकर उत्साह से भर जाते हैं। चारों तरफ बर्फ। आपको अक्सर हिमपात भी देखने को मिलेगा। ठंड से आपकी हालत खराब हो जाएगी। इसलिए ज्यादा देर रूकने की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि यहां ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम होती है।
 'दिसकित मठ’
 दिसकित बौद्ध मठ नुब्रा घाटी में सबसे पुराना और सबसे बड़ा मठ है। इसे 14वीं शताब्दी में बनाया गया था। यहां मैत्री बुद्ध की 32 मीटर लंबी मूर्ति है, जो दूर से ही दिखती है। यह गोम्फा तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुप्पा पीली टोपी वाले संप्रदाय के अंर्तगत आता है।
 'नुब्रा घाटी’
 यह तीन भुजाओं वाली घाटी है, जो लद्दाख घाटी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। इस घाटी की ऊंचाई 10,000 फीट है। इसका प्राचीन नाम डुमरा (फूलों की घाटी) था। श्योक और नुब्रा नदी के बीच है यह घाटी। यहां आप रेत के टिब्बे देख सकते हैं। दो कूबड़ वाले ऊंट की सवारी भी की जा सकती है। हिमालय की चोटियों पर बर्फ नजर आएगा आपको। प्रकृति अपने अप्रतिम रूप में मिलेगी।
 ऐसे पहुंचे लेह
वायु मार्ग
अब सवाल है कि लेह कैसे पहुंचा जाए। यदि, आप वायुमार्ग से जा रहे हैं तो जम्मू, चंडीगढ़, दिल्ली, श्रीनगर से लेह के लिए इंडियन एयरलाइंस की सीधी उड़ानें हैं। लेह शहर में आपको टैक्सी, जीपें या बड़ी गाड़ियां किराए पर लेनी पड़ेंगी। ये स्थानीय ट्रांसपोर्ट तथा बाहरी क्षेत्रों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
 रेलमार्ग
अगर, आप रेलमार्ग से जाना चाहते हैं तो सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू है, जहां से लेह की दूरी मात्र 690 किमी है। जम्मू रेलवे स्टेशन देश के प्रत्येक भाग से रेल द्बारा जुड़ा हुआ है। यहां से बस, टैक्सी व अन्य साधनों से आपको आगे की यात्रा पूरी करनी पड़ेगी।
 सड़क मार्ग
 वहीं, आप अगर सड़क मार्ग से लेह तक पहुंचना चाहते हैं तो इसके लिए जम्मू-श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग बना है। श्रीनगर से लेह 434 किमी, कारगिल 230 किमी तथा जम्मू 690 किमी तथा मनाली से 500 किमी की दूरी पर स्थित है।
 वैसे सड़क मार्ग से जाने वाले या मोटरसाइकिल से यात्रा करने वाले जुलाई से सितबंर तक का मौसम लेह जाने के लिए सबसे अच्छा मानते हैं। दरअसल, सदिर्यों में लेह जाने का एकमात्र साधन हवाई जहाज ही है। मगर, अभी जुलाई से सितंबर के बीच आप सड़क यात्रा कर सकते हैं। दोनों ही रास्तों पर दुनियां के कुछ सबसे ऊंचे दरर् पड़ते हैं। मई से पहले और सितंबर के बाद यहां भारी बर्फबारी होती है, जिस कारण रास्ता बंद हो जाता है। मगर, सड़क मार्ग की खुबसूरती बेमिसाल है।



Comments

  1. I recently watched ‘Mohe Rang Do Lal’ from the blockbuster movie ‘Bajirao Mastani’. Fascinated by the background used in the song, I was curious to know where the song was shot. After some research, I found that the ‘Amer Palace’ at Jaipur was the shooting location of another classic song ‘Mohe Panghat Pe’, from K. Asif’s ‘Mughal E Azam’ in 1960. It brought me into exploring more such places to visit in Jaipur.

    Due to the reddish colour of its historic architecture, Jaipur is affectionately sobriquet “The Pink City”. The princely state has indeed maintained the rich and ancient heritage of Indian culture, no surprise why it also has the nickname ‘The Paris of India’. Hence, it magnetises the traveller from the corners of the globe every year. The write-up articulates seven historical places to visit at Jaipur in 2 days.
    Tourist Places in Jaipur

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