रामकृष्ण और
विवेकानंद की साधना भूमि Dakshineswar kali temple पश्चिम बंगाल के कोलकाता जनपद में
स्थापित है। जिला मुख्यालय से उत्तर पूर्व दिशा में 25 किलोमीटर दूर Dakshineswar
kali temple स्थापित है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार रानी रासमणि ने किया था। मुख्य शहर
से 20 किलोमीटर की दूरी पर 1847 में इसका निर्माण आरंभ हुआ और 1855 में बनकर तैयार
हुए इस काली मंदिर के निर्माण में नौ लाख रुपए की लागत आई थी। चांदी की पंखुडियों वाले
सह्स दल कमल के ऊपर चतुर्भुज युक्त माता काली अपना दायां पांव शिव के सीने में रखकर
विकराल में रूप में खड़ी हैं। सुबह साढ़े पांच बजे से लेकर साढ़े बजे और सायं साढ़े चार
बजे साढ़े सात बजे तक मंदिर के कपाट भक्तों के दर्शन के लिए खुले रहते हैं। काली माता
का दर्शन पाकर भक्त खुद को धन्य समझते हैं, लेकिन देवी दर्शन मंदिर के सामने स्थित
मंडप से ही किया जा सकता है।
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| कोलकाता स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर |
काली माँ ने स्वामी रामकृष्ण परमहंस को दिए थे दर्शन
Dakshineswar kali temple की बात चले और स्वामी रामकृष्ण परमहंस का जिक्र न
आए, ऐसा नहीं हो सकता है। यहां बता दें कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बचपन का नाम गदाधर
चटर्जी था। ईश्वरीय चेतना की सर्वप्रथम अनुभूति उन्हें 6-7 साल की आयु में धान के खेतों में हुई थी। 16 साल की आयु में गदाधर अपने जयेष्ठ भ्राता राजकुमार की देखरेख में पढ़ने
तथा नगर के धर्मभाव संपन्न परिवारों में पूजा करने में उनकी सहायता करने के लिए उनके
साथ कोलकाता चले गए। बाद में, जयेष्ठ भ्राता की बदली काली पुजारी के रूप से पूर्णरूपेण
जुड़ गया व बाद में उनकी भक्ति को देखकर मां काली ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। मंदिर
के उत्तर-पश्चिमी कोने में बने एक कमरे में परमहंस निवास किया करते थे। मां भगवती
का दर्शन श्री परमहंस जी महराज ने इसी गंगा तट पर किया था और इसी स्थान से सिद्धि लाभ
किया था।
मंदिर के प्रागंण
में एक पिनकिन पॉर्क है तथा गंगा नदी से स्टीमर से बेलूर मठ जाया जाता है, जो अति ही
रमणीय है। आज भी यहां भक्तों का समागम होता है। प्रवेशद्धार पर रानी रासमणि का मंदिर
निर्मित है। पास ही अन्नदा ठाकुर प्रतिष्ठित आद्या मंदिर आद्यापीठ है। यहां पद्मासन
में शिव के सीने पर अष्ठधातु द्बारा निर्मित देवी प्रतिमा मुख्य रूप से दर्शनीय है।
70 फीट ऊंचा शिखर
माता काली के मंदिर
का शिखर 70 फुट ऊंचा है और बादामी रंगों में रंगा है। प्रागंण के पश्चिम की तरफ 12
शिव मंदिर, श्री शारदा मंदिर, नौबतखाना बना है। मंदिर के मुख्य द्बार के पीछे तक बरामदा
बना हुआ है, जिसमें ऊंचे गोल खंभे लगे हैं तथा गेरुआ, लाल, बादामी व पीले रंग से अलंकृत
है। मंदिर के द्बार के सामने एक लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी में छह स्टॉफ कार्यरत हैं।
लाइब्रेरी के दाईं तरफ भगवान परमहंस जी महाराज का एक मंदिर है। इसी प्रागंण में वीथिका
नामक बाजार है, जिसमें 65 दुकानें बनी हुईं हैं। उसी की बाईं ओर डाला बाजार है, जिसमें
60 दुकानें हैं। मंदिर में औसतन दो हजार भक्त प्रतिदिन दर्शन करते हैं। विशेष दिनों में जैसे पहली जनवरी को शारदा मां की पूजा होती है। मुख्य मंदिर के बाईं तरफ आंगन में
एक खसटी नामक देवी वृक्ष है। वैशाख के पहले दिन, जो बंगाली लोगों का नया वर्ष होता
है, वह बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। उस दिन काफी भीड़ होती है।13 जून को श्रद्धालुओं के लिए खुले कपाट
कोविड-19
के चलते पिछले डेढ़-दो माह से धार्मिक स्थलों के कपाट बंद थे, लेकिन अब कम भीड़ के साथ कपाट खोलने की अनुमति दे दी
है। इसी क्रम में दक्षिणेश्वर काली मंदिर के
कपाट भी शनिवार 13 जून को खोल दिये गए हैं। मंदिर समिति के न्यासी और सचिव
कौशल चौधरी के अनुसार श्रद्धालुओं के
लिए सुबह 7 से 10 बजे तक और दोपहर में साढ़े 3 बजे से शाम साढ़े 6 बजे तक कपाट खोले
जा रहे हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले श्रद्धालुओं की थर्मल जांच की जा रही
है और उन्हें सेनेटाइज किया जा रहा है, लेकिन इस दौरान किसी को भी मंदिर के गर्भ गृह में जाने की अनुमति नहीं
होगी। मंदिर में रहने दौरान श्रद्धालुओं को सामाजिक दूरी का पालन करना होगा। मंदिर
में रुकने की अनुमति किसी को भी नहीं दी जा रही है।

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