जागेश्वर धाम: शिव की तपोस्थली | jageshwer-dham in hindi

jageshwer: shiv ki taposthali
 उत्तराखंड को यूहीं देवभूमि नहीं कहा जाता। इसका कारण यह है कि यहां हर जगह देवताओं का वास है। वैसे तो कई प्रसिद्ध मंदिर उत्तराखंड में हैं, जहां हर क्षेत्र के लोग दर्शनों के लिए पहुंचते हैं। इन्हीं में एक है jageshwer dhamजागेश्वर धाम जटागंगा के तट पर बसा हुआ है और समुद्र तट से इसकी ऊंचाई करीब 6200 फुट है। यह उत्तराखंड का काफी प्रसिद्ध स्थल है। यहां पर्यटकों को न केवल आध्यात्मिक शक्ति की अनुभूति होती है, बल्कि अद्भूत नैसर्गिक सुंदरता के बीच शांति व सुकून का भी अनुभव होता है। यही वजह है कि जागेश्वर अब काफी लोकप्रिय स्थल बनता जा रहा है। पहले आध्यमिक तौर पर लोग इसे लेते थे और अधिकांशत: लोग भी इसी मन से यहां आते थे, लेकिन अब लोग दोनों वजहों से जागेश्वर को अपने डेस्टीनेशन में शामिल करने लगे हैं। 

जागेश्वर में प्राचीन मंदिरों का समूह 
नागेश के रूप में शिवालय
 जंगलों से भरपूर पहाड़ी के बीचोंबीच स्थित है जागेश्वर धाम। जागेश्वर धाम नागेश के रूप में शिवालय है। यहां पत्थरों से निर्मित कई छोटे-बड़े मंदिर हैं। आसमान छूते देवदार के पेड़ों से घिरे इस शिवालय की अपने-आप में खास विशेषता है, इसीलिए देश-विदेश के हजारों पर्यटक हर साल यहां पहुंचते हैं। यहां मंदिरों का बहुत बड़ा समूह है, जिसमें सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर हैं। मंदिरों के समूह के नीचे जटा गंगा हौले-हौले बहती है, जबकि चारों तरफ देवदार के खूबसूरत पेड़ों से घिरा हुआ जंगल है। बताया जाता है कि देवदार के बहुत पेड़ सदियों पुराने हैं। 
 मंदिरों का समूह
 मुख्य मंदिर परिसर एक ऊंची पत्थर की दीवार से चारों तरफ से घिरा हुआ है, इसकी सीमा के अंदर 124 छोटे-बड़े मंदिरों का समूह है। जो भगवान शिव के लिंग के रूप में समर्पित हैं। हर मंदिर अलग-अलग है, कुछ शिव के विभिन्न रूपों पर आधारित हैं, तो कुछ ब्रहांमडीय पिंडों पर समर्पित नवग्रह के रूप में समर्पित हैं। यहां एक मंदिर शक्ति को समर्पित है, जिसके अंदर देवी की मूर्ति है। वहीं, एक मंदिर दक्षिणमुखी हनुमान जी तो एक मंदिर नवदुर्गा को भी समर्पित है। वैसे, अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग स्थापित हैं। मंदिरों के नामों पर आधारित शिलाखंड पट्टिकाएं मंदिरों के प्रवेशद्बारों पर लगाए गए हैं। इनमें कुबेर मंदिर के ऊपर कुबेर पट्टिका, लाकुलिश मंदिर के ऊपर लाकुलिश पट्टिका और तान्डेश्वर मंदिर के ऊपर नृत्य करते शिव की पट्टिका लगी हुई है। 
 कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रचीन मार्ग
 जागेश्वर की प्रसिद्ध का परचम आज का ही नहीं है, बल्कि प्राचीन समय से है। यह धाम कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्राचीन मार्ग पर पड़ता है। यही वजह है कि इस धाम का जिक्र चीनी यात्री हुआन त्सांग ने भी अपनी यात्रा संस्मरण में किया है। जागेश्वर धाम परिसर के अधिकांश मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली में निर्मित हैं, जिसमें मंदिर संरचना में उसके ऊंचे शिखर को बहुत अधिक प्रधानता दी जाता है, इसीलिए यहां आप देखेंगे कि हर मंदिर का शिखर एक अलग रूप में बना दिखाई देगा। बड़े मंदिरों के शिखर पर तो लकड़ी की छत भी अलग से लगाई गई है। सभी मंदिरों में की गई खुबसूरत नक्काशी हर किसी को प्रभावित करती है। इन्हें देखकर ही प्राचीन नक्काशी का आभास होने लगता है। 

देवदार के खुबसूरत पेड़ों के बीच स्थित प्राचीन मंदिर 
2500 साल पुराना धाम
 यह लगभग 2500 साल पुराना मंदिर स्थल है। बताया भी जाता है कि अधिकांश मंदिरों का निर्माण कत्युरी राजवंश के शासकों ने करवाया था। वह भी सातवीं ईंसवी से लेकर 14 ईंसवी के दौरान। कत्युरी राजवंश ने इस अवधि के दौरान यहां राज किया था। असल में, वह उस काल की बात है, जब उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य हुआ करता था। इसी दौरान हिमालय की पहाड़ियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरी राजा थे। यही वजह है कि इन मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक साफ तौर पर दिखाई देती है। अगर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की मानें तो इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। जिनमें कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरी काल और चंद्र काल शामिल है। यह भी बताया जाता है कि उस काल के राजाओं ने जागेश्वर ही नहीं बल्कि पूरे अल्मोड़ा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण करवाया था। यहां आने वाला हर सैलानी मंदिरों की आकृति, शिलाओं और दरवाजों के चौखटों पर बनाई गई देवी-देवताओं की मूर्तियों का देखकर अभिभूत हो जाता है। हरे-भरे देवदार के आसमान छूते पेड़ों से घिरी यह घाटी अप्रतिम सुकून का अहसास देती है। एक अलग ही दिव्यता से भरपूर है यह घाटी। 
 बारह ज्योर्तिलिंगों में से एक
 पुराणों में जागेश्वर को हाटकेश्वर और भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूण के नाम से भी जाना जाता है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर भगवान विष्णु द्बारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है। यह आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसे योगेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। ऋग्वेद में नागेशं दारुकावने के नाम से भी इसका उल्लेख माना जाता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार जागेश्वर को भगवान शिव की तपोस्थली माना जाता है, लेकिन यहां कालिका, सूर्य, दुर्गा, कालेश्वर और हनुमान जी भी प्रमुख हैं। श्रावण मास में यहां लोगों का खूब जमघट लगता है, क्योंकि हर साल श्रावण मास को यहां पर्व के तौर पर मनाया जाता है। लोग अपनी-अपनी मनोकामना लेकर यहां आते हैं। भारत ही नहीं बल्कि विदेशों के पर्यटक भी यहां अपनी मनोकामना लेकर यहां पहुंचते हैं और कर्मकांड, जप व पार्थिव पूजन आदि में शामिल होते हैं। 
 मंदिरों का किया नवीनीकरण
 कत्यूरी राजा शलिवाहनदेव के शासनकाल के दौरान इन मंदिरों का नवीनीकरण भी किया गया था। बकायदा, मंदिर के मुख्य परिसर में मल्ला राजाओं का एक शिलालेख भी स्थित है, जो उनकी जागेश्वर के प्रति भक्ति को दर्शाता है। बताया जाता है कि कत्यूरी राजाओं ने मंदिर के रख-रखाव के लिए पुजारियों को बकायदा गांव भी दान दिए थे और कुमायूं के चांद राजा मंदिर के संरक्षक हुआ करते थे । यहां के मंदिरों की दीवारों और स्तंभों पर विभिन्न अवधियों के 25 शिलालेख देखने को मिलते हैं, जिनमें अधिकांश सातवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी के बीच के हैं। इन शिलालेखों पर संस्कृत और ब्राह्मी भाषा लिखी हुई है। 
 आदि शंकराचार्य आए थे जागेश्वर
पुराणों में इस बात का उल्लेख है कि जागेश्वर धाम में शिवजी और सप्त ऋषियों ने बड़ी तपस्या की थी। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार भी हो जाती थीं, जिस रूप में वह मांगी जाती थीं। जब आठवीं सदी में यहां आदि शंकराचार्य आए और उन्होंने महामृत्युंजय में स्थापित शिवलिंग को कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। आदि शंकराचार्य के कीलित किए जाने के बाद से यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामना पूर्ण नहीं होती है। यज्ञ और अनुष्ठान कार्य से मंगलकारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।


 सभी हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर
जागेश्वर धाम के मंदिर समूह में हिंदुओं के सभी देवी-देवताओं के मंदिर हैं, लेकिन इनमें दो विशेष मंदिर हैं, जिनमें पहला शिव और दूसरा शिव का महामृत्युंजय के रूप वाला मंदिर शामिल है। मान्यता है कि महामृत्युंजय में जप करने से मृत्यु तुल्य कष्ट भी टल जाता है। ऐसा भी माना जाता है कि इन मंदिरों का निर्माण पांडवों ने करवाया था। यहां स्थापित अन्य मंदिरों की बात करें तो सूर्य मंदिर, चंडी मंदिर, दन्देश्वर, कुबेर, नवदुर्गा, नवा गिरह मंदिर, पिरामिड मंदिर आदि भी शामिल हैं। दन्देश्वर मंदिर जागेश्वर का सबसे बड़ा मंदिर है। 
चारों तरफ बिखरी पड़ी है असीम शांति
भीड़-भाड़ और तनाव से परेशान लोग यहां आकर शांति का अनुभव कर सकते हैं। यह आध्यात्मिक स्थली न केवल मन को आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करती है, बल्कि मन को असीम प्राकृतिक सौंदर्यता के बीच शांति व सुकून का अनुभव भी कराती है। यहां चारों तरफ अद्भुत शांति बिखरी पड़ी है। लोगों की भीड़ के बाद भी यहां कई स्पॉट्स ऐसे हैं, जहां घने देवदार के पेड़ों के बीच मन के तनाव को असीम शांति के माहौल में दूर किया जा सकता है। परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने के लिए यह अद्भुत जगह है। जागेश्वर की धरती पर कदम रखते ही एक अलग से अनुभव की अनुभूति होने लगती है और मन में बेहद हल्कापन महसूस होने लगता है। कई लोग शिव की इस तपोस्थली पर देवदार के खूबसूरत पेड़ों के नीचे ध्यान लगाकर भी अपने मन की गहराईयों तक आध्यात्मिक शक्ति को पहुंचाने की कोशिश भी करते हैं। विदेश पर्यटक तो यहां कई-कई दिनों तक रहते हैं। 
कभी आ सकते हैं यहां
जागेश्वर का जलवायु समशीतोष्ण है यानि यहां गर्मियों के समय में तो आ ही सकते हैं, लेकिन सर्दियों के समय में भी आने के लिए यह अद्भुत जगह है। गर्मियों में जहां ठंडक महसूस की जाती है, वहीं सर्दियों के मौसम में बर्फवारी का लुत्फ उठाया जा सकता है। वैसे अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर का समय यहां आने के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है। वसंत और मानसून के शुभारंभ में यहां आना खास हो सकता है, क्योंकि यहां के मुख्य देवता भगवान शिव के दो त्योहार इन्हीं महीनों में मनाए जाते हैं। पहला शिवरात्रि मेला वसंत के दौरान मनाया जाता है और जागेश्वर महोत्सव मानसून के दौरान मनाया जाता है। 
 कैसे पहुंचे
 यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे उत्तम है। वैसे हवाई और रेल मार्ग से भी यहां पहुंचा जा सकता है, लेकिन हवार्ड अड्डा व रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद भी यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग का प्रयोग करना होगा। सबसे नजदीकी हवाई अड्डे की बात करें तो वह पंतनगर पड़ता है। पंतनगर से जागेश्वर की दूरी करीब 150 किलोमीटर है। इसके अलावा देहरादून स्थित जॉली ग्रांट हवाई अड्डा भी है, जो अधिक दूर पड़ेगा। वहीं, रेल मार्ग काठगोदाम तक है। सड़क मार्ग की बात करें तो यह हर तरफ से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग से यह महज तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, जबकि अल्मोड़ा से यहां की दूरी लगभग 36 किलोमीटर है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से जागेश्वर की बात करें तो यह लगभग 400 किलोमीटर है। दिल्ली से सड़क मार्ग के माध्यम से पहुंचने में यहां लगभग 10-12 घंटे का समय लगता है। रेलमार्ग से अगर आप काठगोदाम उतरते हैं तो काठगोदाम से यहां पहुंचने में करीब चार से पांच घंटा लग जाएगा। 
टैक्सियों की उपलब्धता आसान
 अगर, आप हवाई मार्ग, रेल मार्ग आदि से यहां पहुंचते हैं तो आपको टैक्सी व अन्य पब्लिक ट्रांसपोर्ट की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, क्योंकि यहां इन साधनों की उपलब्धता रहती है। प्राइवेट टैक्सियां बहुतायात चलती हैं, इसके अलावा उत्तराखंड परिवहन निगम की बसों के अलावा प्राइवेट बसें भी चलती हैं।
 ठहरने की व्यवस्था
 वैसे तो यहां ठहरने के लिए आपको दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा, लेकिन भीड़-भाड़ के दौरान इसकी अवश्य मुश्किल होगी। इसीलिए यहां पहुंचने के लिए ऐसा वक्त चूज करें, जिससे आप जागेश्वर धाम के दर्शन कर अल्मोड़ा या अन्य नजदीकी जगहों के लिए निकल सकते हैं। आजकल देखने में आ रहा है कि यहां अधिक भीड़-भाड़ रहने लगी है, हालांकि यहां गेस्ट हाउस इत्यादि हैं, लेकिन सीजन के दौरान ये बिल्कुल फुल रहते हैं। वैसे, अल्मोड़ा के नजदीक होने की वजह से खास दिक्कत भी नहीं आती है। यहां से दर्शन व क्वालिटी समय बिताने के बाद आप वापस अल्मोड़ा भी जा सकते हैं, क्योंकि यहां से अल्मोड़ा की दूरी महज 36 किलोमीटर ही है। 
 खाने-पीने की चीजें
 यहां खाने-पीने के लिए रेस्टोरेंट व छोटे-छोटे होटल इत्यादि हैं, लेकिन यह मानकर चलना होगा कि बड़े टूरिस्ट स्थलों के मुकाबले कम ही होगा। वैसे, यहां पहुंचकर पहाड़ी व्यजंनों का आप लुत्फ उठा सकते हैं। 
राष्ट्रीय राजमार्ग से तीन किलोमीटर दूर
 जागेश्वर विधानसभा क्षेत्र के तहत आता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े अरतोल गांव से यह लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वैसे, मंदिरों के दर्शन तो महज कुछ सौ मीटर की दूरी से होने लगते हैं। जिसमें जाते हुए पहले वृद्ध जागेश्वर के दर्शन होते हैं। इसे यहां का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है। 
 इन बातों का रखें ध्यान
 अगर, आप दूर-दराज से यहां घूमने आ रहे हैं तो आपको बेसिक चीजों का काफी ध्यान रखना होगा। भले ही, यहां खाने-पीने व ठहरने की दिक्कत न हो, लेकिन आपको अपने पास कैश की उपलब्धता रखनी होगी, क्योंकि यहां एटीएम आदि की सुविधा नजदीक में नहीं है। इसीलिए नकदी पास में रखी हो तो उसके लिए आपको एटीएम तलाशने के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा। आसपास एरिया में एटीएम हैं तो कई बार उनमें कैश नहीं होता है या फिर वे खराब रहते हैं। अगर, आप अपने वाहन से यहां पहुंच रहे हैं तो पेट्रोल व डीजल की टंकी भी भरा के लाएं, जिससे आपको यहां दिक्कत न उठानी पड़े, क्योंकि पेट्रोल पंप भी यहां से दूर है। अगर, आप यह व्यवस्था अल्मोड़ा से ही करके लाएं तो अच्छा होगा। 
पॉर्किंग व्यवस्था
 जागेश्वर जैसे-जैसे पर्यटकों के बीच लोकप्रिय हो रहा है, वैसे-वैसे यहां काफी भीड़ बढ़ने लगी है, जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। जागेश्वर धाम घाटी के बीचोंबीच बसा हुआ है। दोनों तरफ पहाड़ियां हैं। इसीलिए उतनी खुली जगह आपको यहां नहीं मिलेगी। कार पॉर्किंग भी करनी है तो आपको सड़क किनारे ही करनी होगी। जिस दौरान भीड़ रहती है, उस वक्त पॉर्किंग की थोड़ी दिक्कत हो सकती है। अगर, सड़क पर काफी भीड़ दिख रही है तो कार साइड में पॉर्क कर पैदल जाया जा सकता है।



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