कनक दुर्गा सिद्धपीठ | kanak durga temple

5000 वर्ष पूर्व अर्जुन ने की पुनप्रतिष्ठा
आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा जनपद में स्थित कनक दुर्गा सिद्धपीठ मंदिर अत्यंत पुरातनकालीन पीठ है। कहा जाता है कि कृष्णा नदी के तट पर इंद्रकालाद्री पर्वत पर स्थापित इस प्राचीन कनक दुर्गा मंदिर की स्थापना पुरातन काल में ब्रह्मा जी द्बारा की गई थी। इसकी पुनप्रतिष्ठा 5000 वर्ष पूर्व पांडुपुत्र अर्जुन द्बारा की गई थी। आठवीं शताब्दी में इसका जीर्णोद्धार तत्कालीन राजाओं द्बारा कराया गया था।
 विजयवाड़ा के इंद्रकीलाद्री पर्वत का इतिहास अत्यंत ही समृद्ध है। इंद्रीकीलाद्री पर्वत पर कील नामक एक यक्ष देवी दुर्गा की तपस्या कर रहा था। उसके तप से प्रसन्न होकर मां दुर्गा प्रकट हुईं और यक्ष से वर मांगने को कहा। यक्ष कील ने कहा कि मुझे केवल एक ही वर चाहिए कि आप सदैव मेरे ह्दय में वास करें और मैं सदैव आपका भक्त बना रहूं। देवी ने कहा कि मैं महिषासुर का वध करने के पश्चात तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगी। तब तक यहीं रहकर मेरी अराधना करो।

कनक दुर्गा सिद्धपीठ
 महिषासुर वध के उपरांत माता ने कील को पुन: दर्शन दिया और वहीं स्थापित हो गईं। इस पर्वत पर मां दुर्गा महिषासुरमर्दिंनी के साथ निवास करती हैं। उनके हाथों में आठ प्रकार के अस्त्र हैं। सतयुग में ब्रह्मा जी ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इस पर्वत पर सौ अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। ब्रह्मा जी ने केसरिया रंग के फूलों से भगवान शिव की पूजा की। भगवान शिव ब्रह्मा जी की तपस्या से प्रसन्न हुए और ज्योतिर्लिंग में जब पांडव वनवास कर रहे थे, तब ऋषियों ने अर्जुन को समझाया कि वह आगामी युद्ध के लिए तत्पर रहें और इसके लिए वह भगवान शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करें। अर्जुन ने पाशुपत अस्त्र प्राप्त करने के लिए इस पर्वत पर भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव ने किरात वेश में उनसे युद्ध किया था। अंत में, शिव ने प्रसन्न होकर अर्जुन को पाशुपात अस्त्र प्रदान किया। अर्जुन ने उस अस्त्र से कौरवों पर विजय प्रा’ की थी, इसीलिए इस स्थान का नाम विजयवाड़ा पड़ा।
  मंदिर में गर्भगृह में माता कनक दुर्गा की 4 फुट ऊंची स्वयंभू मूर्ति दर्शनीय है। प्रतिदिन माता का हीरे-रंगे व स्वर्ण आभूषणों से श्रृंगार किया जाता है। मूर्ति को विभिन्न प्रकार के वस्त्र, सुंगधित फूलों व इत्र, चंदन आदि से सजाया जाता है। इस मंदिर में माता दुर्गा भगवान शिव के दक्षिण की ओर विराजमान हैं। हिंदू दर्शन के अनुसार उत्तर तरफ विराजमान होना, यह इस बात को साबित करता है कि इस स्थान पर कनक दुर्गा को शिच से भी अधिक महत्व दिया गया है। यह स्वयंभू देवी हैं। मंदिर सोन व चांदी से बना है। शिखर स्वर्ण मंडित है। मंदिर हरे पत्थरों द्बारा निर्मित है। मंदिर की दीवारों में बने 8 आलों में आदि लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, वन लक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी, धन्य लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं।
 मंदिर के सभा मंडप में ऊंचा ध्वज स्तम्भ स्थापित है। मंदिर में स्वच्छता अद्बितीय है। श्रीचक्र पूजा कराने वालों को 500 रुपए की रसीद लेनी होती है। प्रसाद बिक्री आदि से आय होती है। मंदिर द्बारा विद्यालय भी चलाए जाते हैं। एक परिसर में प्राचीन शिव मंदिर एवं कनक दुर्गा का मंदिर होने के कारण सभी पर्व धूमधाम से मनाए जाते हैं। शिवरात्रि, सावन, मकर संक्रांति, सोमवार, दुर्गा-पूजा, नवरात्रि, जन्माष्टमी आदि पर्वों पर देश-प्रदेश से भारी संख्या में भक्त आते हैं।
 मंदिर की कमेटी द्बारा चैत्र माह शरदीय नवरात्रि, आषाढ़ माह में शाकंभरी नवरात्रि, आसौह माह में दुर्गा देवी नवरात्रि का आयोजन किया जाता है। शरदीय नवरात्रि के प्रत्येक दिन लक्ष पुष्प अर्चना की जाती है। नौ दिनों तक भक्तों के लिए विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।




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