उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर | ujjain ka nagchandreshwer mandir

 भारत में कोई भी ऐसी जगह नहीं, जहां कोई न कोई मंदिर न हो। कई मंदिर तो काफी अद्भुत हैं और उनकी मान्यता चारों तरफ फैली हुई है। अलग-अलग मान्यता के चलते ऐसे मंदिरों में श्रद्बालुओं का तांता हर समय लगा रहता है। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जो अलग ही विशेषता के चलते मशहूर हैं। ऐसे मंदिरों में उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर भी शामिल है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसके द्बार सिर्फ नाग पंचमी के दिन खुलते हैं यानि की साल में सिर्फ एक दिन। इस मंदिर की यह मान्यता है कि यहां स्वयं नागदेव मौजूद रहते हैं। दुनिया भर के मंदिरों से अलग इसकी एक और विशेषता यह है कि यहां विष्णु भगवान की जगह भगवान शंकर सर्प शैया पर विराजमान रहते हैं। भगवान शंकर के साथ मंदिर में माता पार्वती के अलावा भगवान गणेश भी विराजमान रहते हैं। दुनिया में यह दृश्य सिर्फ इस मंदिर में देखने को मिलता है। नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं सदी की एक अद्भुत प्रतिमा भी है, जिसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं। यह बताया जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से लाई गई थी। इस मंदिर के अलावा दुनिया के किसी भी मंदिर में ऐसी प्रतिमा नहीं है। 


 आधी रात को खुलते हैं दरवाजे
 नाग पंचमी के दिन इस मंदिर के दरवाजे रात को 12 बजे खुलते हैं। इसकी परंपरा भी विशेष है। दरवाजा खुलने के बाद सबसे पहले पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े के महंत भगवान नागचंद्रेश्वर महादेव को पूजते हैं। उसके बाद साफ-सफाई कर पूजा की जाती है, जिसके बाद श्रद्बालु भी मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। 
तीन खंडों में स्थापित है मंदिर
नागचंद्रेश्वर मंदिर को तीन खंडों में स्थापित किया गया है। इस मंदिर को सरकार द्बारा संचालित किया जाता है। यह महाकाल मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से आता है। तीन खंडों के अंतर्गत नीचे खंड में भगवान महाकलेश्वर मंदिर हैं, जबकि दूसरे खंड में ओंकारेश्वर और तीसरे खंड में भगवान नागचंद्रेश्वर का भव्य मंदिर है। माना जाता है कि यह उज्जैन का सबसे प्राचीन मंदिर है। 
इसीलिए बंद रहते हैं दरवाजे
 नागचंद्रेश्वर मंदिर के साल भर दरवाजे बंद रहने के पीछे रहस्य है। कहा जाता है कि नागराज तक्षक ने भगवान शिव को मनाने के लिए बहुत घोर तपस्या की थी। नागराज तक्षक की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव शंकर ने उन्हें अमर रहने का वरदान दिया था। यह भी कहा जाता है कि इस मंदिर में वरदान मिलने के बाद भगवान शिव के शरण में नागराज तक्षक रहने लगे और महाकाल वन में रहने से पहले उनकी प्रबल इच्छा थी कि उनकी एकाग्रता पर किसी प्रकार का विघन हो। तभी से यह प्रथा चलती आ रही है कि केवल नागपंचमी वाले दिन ही वह दर्शन देते हैं। 





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